1 घंटे में कंटेंट हटाने का प्रस्ताव, IT नियम 2026 पर विवाद तेज 1-Hour Content Takedown Proposal – IT Rules 2026 Trigger Nationwide Controversy
IFF ने सरकार से मांगी पारदर्शिता, सार्वजनिक परामर्श की उठाई मांग
नागपुर : देश में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नियंत्रण को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा कथित रूप से “अवैध” कंटेंट हटाने की समय सीमा को घटाकर मात्र 1 घंटे करने के प्रस्ताव ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, डिजिटल अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बीच इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को पत्र लिखकर इस पूरे मामले में पारदर्शिता, स्पष्टता और व्यापक सार्वजनिक परामर्श की मांग की है।1-Hour Content Takedown Proposal – IT Rules 2026 Trigger Nationwide Controversy
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट हटाने के मौजूदा समय को और कम करने पर विचार कर रही है। वर्तमान में यदि किसी कंटेंट को अदालत के आदेश या सरकार की “reasoned intimation” के आधार पर हटाना होता है, तो प्लेटफॉर्म्स को 3 घंटे का समय दिया जाता है। वहीं, गैर-सहमति वाली अंतरंग सामग्री जैसे निजी तस्वीरें, मॉर्फ्ड इमेज या डीपफेक के मामलों में यह समय सीमा 2 घंटे निर्धारित है। अब इसे घटाकर केवल 1 घंटे करने की संभावना जताई जा रही है, जिससे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर दबाव और बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम समय सीमा में किसी कंटेंट की वैधता, संदर्भ और कानूनी स्थिति का सही मूल्यांकन करना लगभग असंभव होगा। इससे प्लेटफॉर्म्स “सेफ साइड” पर रहने के लिए बिना पर्याप्त जांच के कंटेंट हटाने लगेंगे, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कई मामलों में वैध आलोचना, व्यंग्य, पत्रकारिता सामग्री या जनहित के मुद्दों को भी “अवैध” मानकर हटाया जा सकता है।
विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू “अश्लील” कंटेंट की प्रस्तावित नई परिभाषा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार इस परिभाषा का विस्तार करते हुए ऐसे कंटेंट को भी इसमें शामिल करने पर विचार कर रही है, जो देश के सामाजिक, सार्वजनिक और नैतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं की आलोचना करता हो। यदि ऐसा होता है, तो यह परिभाषा अत्यंत व्यापक और अस्पष्ट हो जाएगी, जिससे किसी भी आलोचनात्मक या असहमति वाले विचार को हटाने का आधार मिल सकता है।1-Hour Content Takedown Proposal – IT Rules 2026 Trigger Nationwide Controversy
डिजिटल अधिकारों के विशेषज्ञ इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा मानते हैं। उनका कहना है कि “अश्लीलता” की परिभाषा पहले से ही संवेदनशील और विवादित रही है, और यदि इसमें सामाजिक या राजनीतिक आलोचना को शामिल किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित कर सकता है। इससे सरकार या सत्ता में बैठे लोगों की आलोचना करना भी जोखिम भरा हो सकता है।
IFF ने अपने पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि मंत्रालय की ओर से इन प्रस्तावों पर कोई स्पष्ट और आधिकारिक संचार नहीं किया गया है। इस प्रकार की नीति-निर्माण प्रक्रिया, जो अस्पष्ट और बंद दरवाजों के पीछे चलती है, लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। संगठन का कहना है कि ऐसी नीतियां जो सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती हैं, उन्हें पारदर्शी और सहभागी प्रक्रिया के माध्यम से ही बनाया जाना चाहिए।
संगठन ने यह भी आरोप लगाया है कि कई बार सरकार ऐसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर केवल निजी क्षेत्र या चुनिंदा हितधारकों से ही चर्चा करती है, जबकि सिविल सोसाइटी संगठनों, शिक्षाविदों, तकनीकी विशेषज्ञों और आम नागरिकों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है। इससे नीति निर्माण में विविधता और संतुलन की कमी हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कमजोर और पक्षपाती कानून बनते हैं।
IFF ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि सरकार को प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी, 2014 (PLCP) का पालन करना चाहिए। इस नीति के तहत किसी भी प्रस्तावित कानून या नियम पर कम से कम 30 दिनों का सार्वजनिक परामर्श अनिवार्य है। हालांकि, हाल ही में जारी ड्राफ्ट IT संशोधन नियमों के लिए केवल 15 दिनों का समय दिया गया है, जिसे संगठन ने अपर्याप्त और नियमों के खिलाफ बताया है।
संगठन ने 31 मार्च और 1 अप्रैल 2026 को MeitY को लिखे अपने पत्रों में यह मांग की है कि ड्राफ्ट नियमों पर व्यापक, खुला और बहु-हितधारक परामर्श किया जाए। इसके साथ ही, फीडबैक जमा करने की समय सीमा को बढ़ाकर पहले 30 अप्रैल 2026 और फिर 15 मई 2026 तक किया जाए, ताकि सभी संबंधित पक्ष पर्याप्त समय लेकर अपने सुझाव दे सकें।
IFF ने यह भी मांग की है कि मंत्रालय को प्राप्त सभी टिप्पणियों और सुझावों को सार्वजनिक किया जाए। वर्तमान में कई मामलों में सरकार इन टिप्पणियों को “fiduciary” मानकर सार्वजनिक नहीं करती, जो पारदर्शिता के सिद्धांत के विपरीत है। यदि इन सुझावों को सार्वजनिक किया जाता है, तो इससे नीति निर्माण प्रक्रिया में विश्वास और जवाबदेही बढ़ेगी।
इसके अलावा, संगठन ने सुझाव दिया है कि इस विषय पर एक ओपन-हाउस चर्चा आयोजित की जाए, जिसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यह चर्चा विभिन्न भारतीय भाषाओं में होनी चाहिए और इसमें तकनीकी विशेषज्ञों, कानूनी विशेषज्ञों, पत्रकारों, सिविल सोसाइटी और आम नागरिकों को शामिल किया जाना चाहिए।1-Hour Content Takedown Proposal – IT Rules 2026 Trigger Nationwide Controversy
हाल के महीनों में सोशल मीडिया पर कंटेंट हटाने और अकाउंट ब्लॉक करने की घटनाओं में भी वृद्धि देखी गई है। कई यूजर्स ने शिकायत की है कि उनके पोस्ट, जिनमें सरकार या नीतियों की आलोचना की गई थी, अचानक हटा दिए गए या उनके अकाउंट्स को ब्लॉक कर दिया गया। इससे यह आशंका और मजबूत होती है कि प्रस्तावित नियमों का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए किया जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट किया है कि कंटेंट हटाने की कार्रवाई केवल न्यायिक आदेश या वैध सरकारी निर्देश के आधार पर ही की जानी चाहिए। यदि नए नियम इस सीमा को कमजोर करते हैं और प्रशासनिक निर्देशों को अधिक शक्तिशाली बनाते हैं, तो यह संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। यदि उन्हें बहुत कम समय में कंटेंट हटाने का आदेश दिया जाता है, तो वे कानूनी जोखिम से बचने के लिए अधिक सतर्क रुख अपनाएंगे और बड़ी मात्रा में कंटेंट हटाने लगेंगे। इससे प्लेटफॉर्म्स पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है और उपयोगकर्ताओं का भरोसा भी कम हो सकता है।
वर्तमान परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि सरकार एक ओर डिजिटल स्पेस को नियंत्रित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, जबकि दूसरी ओर नागरिक समाज और विशेषज्ञ अधिक पारदर्शिता और संतुलन की मांग कर रहे हैं। यह टकराव आने वाले समय में और तेज हो सकता है, खासकर यदि प्रस्तावित नियमों को बिना व्यापक चर्चा के लागू किया जाता है।
अंततः, यह मुद्दा केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है। डिजिटल युग में सोशल मीडिया न केवल सूचना का माध्यम है, बल्कि यह विचारों के आदान-प्रदान और सार्वजनिक संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच भी है। ऐसे में किसी भी प्रकार का अत्यधिक नियंत्रण या अस्पष्ट नियम न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करेंगे, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे को भी कमजोर कर सकते हैं।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इन चिंताओं पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है और क्या वह एक पारदर्शी, समावेशी और संतुलित नीति निर्माण प्रक्रिया अपनाती है या नहीं। यदि सरकार इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाती है, तो यह डिजिटल अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।
